बुधवार, 20 जुलाई 2016

The history of SWADHIN BHARAT

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स्वाधीन भारत का इतिहास 

 स्वाधीन भारत-
सर्वप्रथम स्वाधीन भारत का बिशिष्ट नाम कृषक भारत था । इसका अर्थ है किसानों का भारत । बताया जाता है १९९७ में इस समूह को किसानों का भारत के नाम से जाना जाता था । भारत के किसानों की आत्मनिर्भरता, स्वतंत्रत pklgifbf]+ sf cg';/)f s/g] s] साथ ही भारत एक कृषि प्रधान देश भी रहा है जिसके आधार पर इसका नाम कृषक भारत पड़ा । इसके स्वघोषित समूह भारत निर्माण में मूलरूप से कुछ लोगों ने सहायक की भूमिका निभाई है । बाद में वही गिने चुने सहायक लोगों ने कृषक भारत के नाम को रूपांतरित कर स्वाधीन भारत बना दिया । इसका मूल कार्य भारतीय रुपये की आतंरिक क्रय शक्ति और सम्प्रभुता की रक्षा-सुरक्षा जैसे राष्ट्रीय योगदान होने के कारण स्वतः xL राष्ट्रीय आंदोलन में परिवर्तित हो गया ।

स्वाधीन भारत फ्लैग

स्वाधीन भारत फ्लैग- 
इसका झंडा फिरोजी रंग का था । झंडे के बीचो बीच ग्लोब बनाया हुआ था जिसमे भारत का नक्सा बना हुआ था ।  भारत के नक्से के निचे, तल में आसमानी रंग में बहता हुआ पानी दर्शाया गया था । ऐसा लगता है कि कोई विश्व सम्राट देश का नक्सा हो, जैसा की आप तस्वीर में देख सकते हैं ।  

स्वाधीन भारत को त्याग पत्र -
कृषक भारत से स्वाधीन भारत तक का सफर तय करने में मूलतः पांच बिशिष्ट व्यक्तियों की मुख्य भूमिका रही । जिसमे अग्रगणी नेता, प्रणेता के रूप में रामबृक्ष यादव को माना जाता है। इनके अलावा पारसनाथ कुशवाहा, प्रेमचन्द सिंह, घनश्याम वर्मा, बीजी पटेल और बाद में बिनोद सिंह आदि लोगों ने अलग-अलग रूप से अपना योगदान दिया । आपसी बेमेल होने के कारण जुलाई 2014 रामबृक्ष यादव को छोड़ कर ये सभी सत्याग्रही एक अलग समूह आज़ाद भारत विधिक वैचारिक क्रान्ति जन- जागरण स्वघोषित किया । जिसका का शुभारम्भ 15 दिसंबर 2014 को लखनऊ हवाई अड्डे से हो चूका है।
उन्होंने आर्टिकल 51 के आधार पर भारत को सम्बोधित किया और कहा भारत के संप्रभुता की रक्षा करना सभी भारतीयों का कर्त्तव्य है अतः अपनी भागीदारी देते हुए - 
स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदेशों को हृदय में संजोये रखे और उसका पालन करे ।
भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे ।
देश की रक्षा करें ।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करें ।   

स्वाधीन भारत टाइमलाइन



 नेताजी सुभाष चन्द्र बॉस का सिद्धांत-
स्वाधीन भारत करेंसी नामक किताब में नेताजी सुभास चन्द्र बोस के सिद्धांतों का जिक्र भी मिलता है जो इस प्रकार है - NETAJI 'S FORMULA - DETERMINATION NOT TO BORROW LOANS AS IT MAY DESTROY THE ECONOMIC FUTURE OF THE COUNTRY इससे पता चलता है कि ये लोग सुभाष बाबू के सिद्धांतों की पूरी कदर करते थे और राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पित थे । अधिक जानकारी एकत्रित करने से पता चल रहा है कि रामबृक्ष यादव ने कुल 5 किताब खुद लिखा है ।
1- रूपया फ्रॉड
2- रूपया का बहिष्कार 
3- स्वयम्भू सम्राट भारत की आवाज
4- स्वाधीन भारत कर्रेंसी
5- नेताजी सुभास चन्द्र बोस

बाबा जयगुरुदेव पर दृढ़ कथन
जवाहर बाग हत्याकांड के अनगिनत तथ्यों को देश-दुनिया के समक्ष नहीं आने दिया गया और उ. प्र. शासन (प्रान्त सरकार) द्वारा छिपाया गया । इस दावे में कितनी सच्चाई है यह किसी को नहीं मालूम लेकिन ऐसा ही हुआ था वहां पर । सच्चाई सामने रखने के प्रयास में उन्होंने ऐसा किया होगा ऐसा माना जा रहा है । अधिकतम तथ्यों को ढूंढने पर पता चलता है कि रामबृक्ष यादव ने कभी किसी तथ्य पर इतना बड़ा दावा आज तक नहीं किया था । बल्कि वे सभी को यही सिखाते आये है कि किसी भी घटना का खुद दावा करने से अच्छा है कि आप लोगों के बीच ऐसा  व्यवहार करें की सच्चाई जनसाधारण खुद ब खुद जानने को तैयार हो जाए - जवाहर बाग़ मथुरा में जब न्याय की फरियाद करते-करते एड़ी से चोटी लगा दिया, क़ानून का दरवाजा भी खटखटाया इसके बावजूद जब किसी ने नहीं माना तो 02-06-2016 की घटना से पहले जवाहर बाग़ गेट के सामने चिल्ला चिल्ला कर भरी मीडिया और प्रशासन के सामने दावा ही नहीं बल्कि चैलेन्ज कर दिया ...... अगर है तुममे दम या क़ानून को वाकई मानते हो तो ...... अभी जयगुरुदेव आश्रम पर चलो मेरे साथ बाबा जी अगर न निकल आये आश्रम से तो मैं साइनाइड चाट कर तुम लोगों के सामने अपनी जान दे दूंगा !

व्यवस्था-

इसमें छोटे-छोटे किसान वर्ग के लगभग 95 फीसदी लोग थे । जिन्होंने अपने घर, दुकान, मकान, जमीन, गहने, यहाँ तक बताया जाता है कि माताएं शारीरिक सहयोग हेतु अपने बच्चों को भी दान कर दिया था । इन गरीब मजदूरों के दिए गए रुपयों को अनुदान स्वरुप खर्च के रूप में स्वीकार किया जाता था । 2010 से ले कर 2016 तक का स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह अंतिम रैली और सत्याग्रह तक के खर्चेका हिसाब किताब साथ चलने वाले किसान, मजदूर, बूढ़े, बच्चे और जवानो ने उठाया, यहाँ तक की अपने साथ भोजन की व्यवस्था सार्वजनिक रूप से की जाती थी ।


स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह का भारत भ्रमण-
शासन/ प्रशासन को जन सूचना देते हुए मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखण्ड, बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब होते हुए उत्तर-प्रदेश की प।वन भूमि जवाहर बाग़, मथुरा पंहुच कर लगभग ढाई साल जोकि अब तक के सबसे लम्बे समय तक चले सत्याग्रहियों ने अपने प्राणो की आहुति दे कर भारत के इतिहास में अपना नाम दर्ज कर दिया ।

साक्षात्कार-
थोड़ी सी बुद्धि का प्रयोग करने से यह पता लगाया जा सकता है कि इंसान कभी रुपये के लिए अपनी जान नहीं देता बल्कि अपने आदर्शों के लिए अपना सब कुछ गवां देता है यहाँ तक जरुरत पड़ने पर अपनी जान तक न्योछावर कर देता है । इस लेख से देश को अवगत करना चाहेंगे कि स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रही कानून से एक कदम आगे बढ़ कर सिद्धांतवादी विचारों से प्रेरित होते हुए घटते रुपये की क्रय-शक्ति के sf/)f बढ़ने वाली महंगाई की अट्टहास s/tL सम्पूर्ण ब्रिटिश मुद्रा प्रणाली की पूंजीवादी व्यवस्था का बहिष्कार किया । उनके लेखों का अध्ययन करने से पता चलता है कि उनका यह मानना था भारत में भारत का क़ानून लागु होना चाहिए और भारत की उत्पादन क्षमता (जीडीपी) पर भारतीय रुपये का मूल्य भारत के अपने ही अधिनियमों पर निर्धारित किया जाना चाहिए । lh;] नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने कहा - भारत की अर्थव्यस्था को स्वभावतः सोने की मान्यता को त्यागना पड़ेगा और इस मत को स्वीकार करना पड़ेगा की भारतीय सम्पदा परिश्रम और उत्पादन पर निर्भर करता है न कि सोने पर । विदेशी व्यापार को भारतीय सरकार के नियंत्रण में लाया जाना चाहिए और जर्मनी के बार्टर सिद्धांत (सन १९३३) के आधार पर सुनियोजित की जानी चाहिए ।


शासन/प्रशासन का बयान-
पुलिस का दावा है कि जवाहर बाग में भड़की हिंसा में रामवृक्ष की मौत हो गई है, जिसकी तस्वीरें पुलिस ने मीडिया को दी थीं। अगर देखा जाए तो पुलिस द्वारा दी गई मृत राम वृक्ष की तस्वीर और जिंदा रामवृक्ष की तस्वीर में अंतर नजर आया है। रामवृक्ष यादव का अगर जिंदा फोटो देखें तो उसका चेहरा लंबा था और सिर के बाल कुछ कम थे, लेकिन मृत रामवृक्ष के फोटो में चेहरा गोल और सिर पर बाल ज्यादा थे ।
जवाहर बाग की घटना के वे पक्ष जो अभी भी अनसुने हैं

जन-साधारण का बयान-
जैसा रामबृक्ष यादव को टेलीविज़न और न्यूजपेपर में दिखाया गया माना जाता है ऐसे वे बिलकुल भी नहीं थे । रामबृक्ष यादव नक्सली नहीं सत्याग्रही थे और स्वभावतः क़ानून को फॉलो करना और करना  उनकी पहली प्राथमिकता होती थी । उनका मानना था देश में कानून का शासन है व्यक्ति का नहीं अतः कोई भी न्याय कानून ही करेगा लेकिन अपने राष्ट्र भारत का होना चाहिए । मथुरा की ऐतिहासिक भूमि जवाहर बाग़ जो मथुरा कलेक्ट्रेट के समीप है । जिसके] बहुत सारे अनसुलझे सवालों का खुलासा किया जाना बाकि है । कुछ खुलासे बिन्दुवार कलम बद्ध करने के प्रयास अभी भी जारी हैं ।   
1- जवाहर बाग़ मथुरा की धरती पर देश के लिए हम और आप के लिए लड़ते हुए लगभग 1000
    सत्याग्रही शहीद हो गए, जबकि भारत को कुल 27 मौतें मात्र बताई गयी ।
2- यह पवित्र धरती आज़ाद हिन्द सरकार के पूर्व के सेनानी राजा महेंद्र प्रताप सिंह की बताई जा रही
    है । एक सच और जान लें इस जमीन का रिकार्ड मथुरा तहसील से लेकर लखनऊ तक गायब कर
    दिया गया है ।
3- सत्याग्रहियों का यह मानना था की भारत में कानून का शासन है व्यक्ति का नहीं इसी उम्मीद के
    आधार पर जवाहर बाग़ से भारतीय रुपये के विधिक प्रारूप की सत्य प्रतिलिपि की मांग के साथ ही
    बाबा जयगुरुदेव के विवादित पार्थिव शरीर के स्पष्टीकरण हेतु सूचना का अधिकार अधिनियम
    2005 का और हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट, अन्य कानून के सभी प्रावधानों का पूरा अनुपालन
    किया  ।
4- दुनिया को टेलीविज़न पर अलग- अलग थानों के हथियार दिखा कर उन्हें नक्सली बनाने का पूरा
    पूरा प्रयास शासन, प्रशासन ने किया इसके बाद न्यूज़ पेपर के माध्यम से आ रही खबर के अनुसार
    अब जवाहर बाग़ मथुरा के हथियारों को नष्ट किया जा रहा है ।
5- पीटे जा रहे एसपी मुकुल दिवेदी और संतोष फरह को सत्याग्रहियों से खुद रामबृक्ष यादव ने छुड़ाया
    उस वक्त दोनों जीवित थे, सत्याग्रहियों के पास लाइसेंसयुक्त कुल चार हथियार थे जिसमे परिजनों
    पर जानलेवा हमले की  अफरा तफरी के कारण ठीक से इस्तेमाल नहीं किया गया ।
6- उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में जवाहर बाग में हुई हिंसा के बाद आज रामवृक्ष यादव के  वकील  मीडिया से रूबरू हुए । उन्होंने दावा किया है कि जवाहर बाग के दौरान हुई हिंसा में राम वृक्ष यादव की मौत नहीं हुई थी रामवृक्ष यादव हिंसा के दौरान सिर्फ घायल हुआ था, जिसे कई लोगों के द्वारा हिंसा के वक्त पुलिस लाइन की तरफ से भागते देखा गया। इसके साथ ही वह दावा कर रहे हैं कि इसकी क्लिप भी है, लेकिन उन्होंने वो क्लिप अपने पास मौजूद होने से मना भी किया है

अन्य टिप्पड़ी-
यह कहना भी गलत होगा कि स्वघोषित संगठन स्वाधीन भारत जिसे किसी का संरक्षण प्राप्त नहीं था । भारत का इतिहास गवाह है किसी चीज से निर्माण में किसी न किसी का योगदान या प्रेरणा होती है जिसके आधार पर उसकी बुनियाद रखी जाती है । जबकि इस स्वघोषित समूह ने इतने बड़े लक्ष्य को धारण करते हुए स्वाधीन भारत बनाम ब्रिटिश इण्डिया गवर्नमेण्ट अर्थात आज के पूंजीवादी ब्रिटिश मुद्रा प्रणाली पर सवालिया निशान लगा कर कटघरे में खड़ा कर दिया जिसमे शासन, प्रशासन, न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका ये सभी आ चुके है । यह आंदोलन कैपिटलिस्म प्रणाली को ख़त्म कर सोसलिस्म प्रणाली को स्थापित करने की बात कह रहा है । कानून से एक कदम आगे बढ़ कर सिद्धांत की बात करने वाले किसी श्रेष्ठ महापुरुष के विचारों से प्रेरित हैं। जोकि साधारण प्रतीत होता नहीं लग रहा है

बैंकों का मायाजाल
बैंकों का मायाजाल : एक अनकही सच्चाई जब कोई व्यवस्था अपने मूल स्वरूप से हटकर नियंत्रण का साधन बन जाती है, तो वह आम जनता के जीवन, श्रम और संपत्ति पर अदृश्य अधिकार स्थापित कर लेती है।
भारतीय बैंकिंग प्रणाली के संबंध में भी यही प्रश्न उठता है— “रुपये की वास्तविक शक्ति किसके हाथ में है?” और “जनता से उसकी आर्थिक स्वतंत्रता किस प्रकार धीरे-धीरे छीन ली गई?”

इतिहास गवाह है कि जिन-जिन लोगों ने रुपये के विषय में सच बोलने का साहस किया, जिन्होंने यह प्रश्न उठाया कि रुपया आखिर किस मूल्य का प्रतिनिधि है, या जो लोग मुद्रा, ऋण व्यवस्थाओं और बैंकिंग ढांचे के रहस्यों को उजागर करने के प्रयास में लगे उन्हें केवल अवहेलना ही नहीं झेलनी पड़ी, बल्कि कई मामलों में उन्हें समाज और व्यवस्था से गायब कर दिया गया । यह कोई कल्पना नहीं, इस विषय पर अध्ययन करने पर ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं— जो बताते हैं कि रुपया सिर्फ मुद्रा नहीं, सत्ता का वह अदृश्य तंत्र है
जिसे समझने की अनुमति हर किसी को नहीं दी जाती । — अभिमन्यु सिंह

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